Jai Ho Vijay Ho
Spiritual & PranYog Healing Centre Bhopal {MP} 462042
30 Oct 2020

प्राण योग से क्रोध / गुस्सा , अवसाद , चिंता , तनाव , नकारात्मक विचार ,अनिद्रा ,आक्रामकता मुक्त कैसे बनें | { तुरंत असरकारक } | { तुरंत असरकारक } Cure Anxiety; Insomnia,Negative Thought, Anger,Depression, Stress Through PranYoga

यह प्राण योग ध्यान ध्वनि तरंगों के माध्यम आपकी प्राण शक्ति में वृद्धि करती है, जिससे प्राण और उदान नामक प्राण संतुलित होने से मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले Endorphins , Serotonin, Dopamine, Oxytocin आदि हार्मोन्स का उत्पादन, और संतुलन होने लगता है | { इन सभी को हैप्पी हार्मोन्स के नाम से जाना जाता है } जिससे व्यक्ति के विकार दूर होकर उसे आत्मिक आनंद की अनुभूति होने लगती है | प्राण योग द्वारा ध्वनि तरंगो के माध्यम से ह्रदय और विशुद्धि चक्र को संतुलित किया गया है, जिससे ह्रदय सम्बन्धी समस्त विकार दूर होते है, विशुद्धि चक्र के संतुलन से वाणी सम्बन्धी दोष दूर हो जाते है | प्राण योग ध्यान आपके मस्तिष्क में अल्फ़ा तरंगो को बढ़ा देता है, जिससे व्यक्ति को शान्ति ,आनन्द की प्राप्ति और तनाव से मुक्ति मिलती है | ये मैडिटेशन तरंगे आंतरिक अंगो में एक्युप्रेशर का कार्य करती है |

साधना विधि –

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प्राण योग ध्यान को सुनना शुरू कीजिये ,सीधे आसमान की तरफ मुँह करके लेट जाएँ हथेलियां आसमान की तरफ अधखुली हो , शरीर को शिथिल छोड़ दीजिये , आँखे बंद कीजिये , अब जोर जोर से साँस लेना और छोड़ना शुरू कीजिये , ऐसा छह मिनिट तक करना है, अब कल्पना कीजिए , प्राण ऊर्जा आपके शरीर में आ रही है , जो आपकी चिंता , तनाव सहित समस्त समस्याओं को ठीक करने जा रही है , फिर शरीर को शिथिल छोड़ दें , प्राण योग ध्यान मैडिटेशन की ध्वनि को आपने आज्ञा चक्र { माथे पर दोनों आँखों के बीच } पर 9 मिनिट तक महसूस करे | अब आँखे खोल लीजिये , आप अपने आप को एक नयी दिव्य ऊर्जा से परिपूर्ण पायेगें | और चिन्ता और तनाव से भी आप मुक्त हो चुके है |

26 Oct 2020

प्राण योग से थायराइड से मुक्ति

थायराइड तितली के आकार की ग्रंथि होती है। यह गर्दन के अंदर और कॉलरबोन के ठीक ऊपर स्थित होती है। थायराइड एक प्रकार की एंडोक्राइन ग्रंथि (नलिकाहीन ग्रन्थियां) है, जो हार्मोन बनाती है। थायराइड विकार एक आम समस्‍या है जो पुरुषों से ज्‍यादा महिलाओं को प्रभावित करती है। प्रमुख तौर पर थायराइड दो प्रकार का होता है –

हाइपरथायराइड और हाइपोथायराइड। हाइपरथायराइडिज्‍म में अत्‍यधिक मात्रा में थायराइड हार्मोन बनने लगता है जबकि हाइपोथायराइडिजम में इस हार्मोन का उत्‍पादन कम होता है।.

थायराइड संबंधी समस्याएं के लक्षण –

1. हाइपरथायराइडिज्‍म के सबसे सामान्‍य लक्षण हैं: वजन कम होना घबराहट, चिंता, परेशानी और मूड बदलना थकान सांस फूलना दिल की धड़कन तेज होना गर्मी ज्‍यादा लगना कम नींद आना अधिक प्‍यास लगना आंखों में लालपन और सूखापन होना बाल झड़ना और बालों का पतला होना

2. हाइपोथायराइडिज्‍म 

हाइपोथायराइडिज्‍म के सबसे सामान्‍य लक्षण हैं: वजन बढ़ना थकान नाखूनों और बालों का कमजोर होना त्‍वचा का रूखा और पतला होना बालों का झड़ना सर्दी ज्‍यादा लगना अवसाद (डिप्रेशन) मांसपेशियों में अकड़न गला बैठना मानसिक तनाव.

थायरॉयड का उपचार-

किसी भी आसन में बैठ जाएँ , सम्पूर्ण शरीर को शिथिल छोड़ दे, अपनी आँखे बंद कीजिए | 9 बार लम्बी गहरी साँस लें |

शंख मुद्रा लगाए ,

शंख मुद्रा

 

फिर प्राण ऊर्जा ध्यान की ध्वनि को सुने , इसकी लिंक यहाँ दी गयी है |

प्राण ऊर्जा ध्यान

इस समय धीरे – धीरे , लम्बी गहरी साँस लेते रहे | ध्यान समाप्ति पर अपने दोनों हाथो को आपस में रगड़िये , और उत्पन्न हुयी प्राण ऊर्जा को अपने हाथों के स्पर्श से गर्दन में प्रवाहित होने दे , फिर धीरे धीरे अपनी आँखे खोलें |

ध्यान समय = न्यूनतम 30 मिनिट्स |

अन्य निर्देश=

1. समुद्री नमक के स्थान पर सेंधा नमक , का ही प्रयोग करें , आयोडीन युक्त नमक ही इस समस्या की जड़ है |

2 प्राण योग ध्यान के समय किसी भी नशीले पदार्थों , मांस , मिर्च मसालों का प्रयोग वर्जित है |

3 . शक्कर की जगह खांड शक्कर या गुड़ का प्रयोग करें |

4 .रिफाइन तेल के स्थान पर कच्ची घानी का तेल प्रयोग करें |

5 .पार्क या खेत में 30 मिनिट प्रतिदिन नंगे पैर भ्रमण करें | और दिन में दो बार प्याज के रस की गले पर मालिस करें |

6 .एक माह बाद , अपनी थाइरोइड की जाँच करवाएं , अब आप पूरी तरह से ठीक हो चुके होंगे | 

26 Oct 2020

प्राणयोग द्वारा घुटनों के दर्द से मुक्ति– तुरंत आराम पाएं

प्राणयोग द्वारा घुटनों के दर्द से मुक्ति — तुरंत आराम पाएं

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प्राण योग चिकित्सा फ्रीक्वेंसी , एनर्जी ,और वाइब्रेशन पर आधारित है, इसमें ध्वनि को चक्रों और पंच तत्वों की फ्रीक्वेंसी , शरीर की असंतुलित हो चुकी प्राण ऊर्जा और सम्बंधित अंग विशेष के वाइब्रेशन पर निर्धारित करके ध्यान संगीत के माध्यम से पीड़ित व्यक्ति को दिया जाता है | यह चिकित्सा आंतरिक अंगो पर एक्यूप्रेशर का कार्य करती है | यह दुष्प्रभाव रहित भारतीय चिकित्सा पद्धति है, इस चिकित्सा में चक्रों का संतुलन , ऊर्जा का परिमार्जन, और पञ्च तत्वों का संतुलन सब साथ – साथ किया जाता है | प्राण ऊर्जा पर आधारित यह चिकित्सा अत्यंत प्रभावी है , इसमें ध्वनि तरंगों द्वारा प्राण तत्त्व को पुन: स्थापित करके , शरीर में ऊर्जा का संतुलन किया जाता है, फलस्वरूप शरीर स्वत: हीलिंग प्रक्रिया शुरू कर देता है |

विधि –

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सबसे पहले किसी शांत स्थान पर बैठे , सारे शरीर को शिथिल करते हुए , नाभि से खींचते हुए 12 बार लम्बी गहरी साँस लें | फिर शरीर को शिथिल करते हुए , आँखे बंद करके , अस्थि आरोग्य प्राण ऊर्जा ध्वनि को अपने दर्द वाले स्थान पर महसूस करे | इसी दौरान पारस मुद्रा 30 बार करें , पारस मुद्रा की लिंक यहाँ दी जा रही है |

चित्र और वीडियो में दिए गए निर्देशों के अनुसार पारस मुद्रा दिन में तीन बार , तीस -तीस बार करने से घुटनो के ऑप्रेशन के लिए जा रहे मरीज भी चमत्कारिक रूप से ठीक हुए है , इस मुद्रा को करते ही आराम लगना शुरू हो जाता है | इस मुद्रा को करते समय ” ॐ नमाय : शिवाय का जाप जरूर करें | फिर आँखे खोलकर हाथों को आपस में रगड़कर दर्द वाले स्थान पर 2 मिनिट्स तक दोनों हाथों की मध्यमा अंगुली { Middle Finger } और अनामिकाअंगुली { Ring Finger } को प्राण ऊर्जा दें { मध्यमा अंगुली और अनामिका अंगुली पर मसाज करें } | अब आपको दर्द में तेजी से सुधार होता हुआ दिखाई देगा | यह आपको 21 दिन तक करना है, दिन या रात , सुबह या शाम किसी भी समय कर सकते है | सोते , जागते , चलते फिरते किसी भी अवस्था में किया जा सकता है |

समय – कम से कम 21 मिनिट्स |

अवधि – 21 दिन तक |

जोड़ों की समस्या का अन्य घरेलु समाधान — योगी योगानंद {अध्यात्म ,योग गुरु }

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1 . गठिया का इलाज – आँवला , मैथी , अजवायन , छोटी हरड़ सभी का पाउडर बनाकर , उसने सेंधा नमक मिलाकर सुबह -शाम आधा चम्मच महीने भर लेने से गठिया ठीक होता है |

2 . घुटनों में लिक्विड समाप्त हो जाना 

एक कप गुनगुने पानी में तीन चम्मच एप्पल साइडर विनेगर तथा 1 चम्मच शहद मिलकर 40 दिन तक दिन में तीन बार पीने से घुटनों में समाप्त हुआ सायनोवियल फ्लूड बनना शुरू हो जाता है | घुटनों की सायनोवियल कम होने के निम्न लिखित कारणों को दूर करने का प्रयास करें | रात को जागने की आदत अधिक चिंता करना गिरने से चोट लगना अधिक वजन होना कब्ज रहना खाना जल्दी-जल्दी खाने की आदत फास्ट-फूड का अधिक सेवन तली हुई चीजें बहुत ज्‍यादा खाना कम मात्रा में पानी पीना या खड़े होकर पानी पीना बॉडी में कैल्शियम की कमी

3 . घुटनों में सूजन आना

भोजन में दालचीनी, जीरा, अदरक और हल्दी का उपयोग ज्यादा से ज्यादा करें। गर्म तासीर वाले इन पदार्थों के सेवन से घुटनों की सूजन और दर्द कम होता है। दालचीनी की छाल का चूर्ण तैयार कर एक कप पानी के साथ लगभग 2 ग्राम चूर्ण मिलाकर प्रतिदिन सुबह भोजन के बाद लिया जाए तो जोड़ दर्द में तेजी से आराम मिलता है और सूजन ठीक होती है | करीब 8-10 लहसुन की कलियों को तेल या घी के साथ फ्राई कर लिया जाए और खाने से पहले चबाया जाए तो जोड़ दर्द में तेजी से आराम मिलता है, ऐसा प्रतिदिन किया जाना चाहिए। लहसुन की कलियों को सरसों के तेल के साथ कुचलकर गर्म किया जाए और कपूर मिलाकर जोड़ों या दर्द वाले हिस्सों पर लगाकर मालिश की जाए तो भी तेजी से आराम मिलता है।

4 . घुटनों में गर्माहट रहना या जलन पड़ना –

मेथी दाना, सौंठ और हल्दी बराबर मात्रा में मिला कर तवे या कढ़ाई में भून कर पीस लें। रोजाना एक चम्मच चूर्ण सुबह-शाम भोजन करने के बाद गर्म पानी के साथ लें।

5 . कार्टिलेज का टूटना या घिस जाना 

रोज सुबह खाली पेट, तीन चम्मच देसी चना , एक चम्मच मेथी अंकुरित करके खाने से कार्टिलेज की समस्या का समाधान हो जाता है | आप सुबह खाली पेट लहसुन की एक कली दही के साथ खाएं। अलसी के दानों के साथ दो अखरोट की गिरी सेवन करने से जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है।

6 . घुटनों में गैप आना

गेहूँ के दाने के आकार के बराबर चूना दही या दूध में घोलकर दिन में एक बार खाएं। इससे अगर घुटनों की तकलीफ नई नई है तो 6 -7 दिन में ही घुटनों का दर्द ठीक हो जाता है, अगर ज्यादा समय से समस्या है तो इसे 90 दिन तक लेने से कैल्शियम की कमी दूर होगीऔर घुटनों में आया गैप प्राकृतिक रूप से ठीक होगा |

7 . लिगामेंट का टूट जाना –

दालचीनी,अननास, ओटमील, संतरे का जूस, बादाम, शहद आदि को मिलकर ज्यूस बनाकर तीस दिन तक पीने से लिगामेंट की समस्या से निजात मिलती है | प्राण ऊर्जा से लिगमेंट का इलाज संभव है , अनेक मरीजों को तुरंत एक मिनिट में ही पूरी तरह ठीक होते देखा गया है |

8 . जोड़ों में कड़ापन आना –

50 ग्राम पालक , 50 ग्राम पार्शली पांच गाजर , एक आँवला , 10 ग्राम पुदीना , 50 ग्राम लौकी ,एक मूली , एक टमाटर को लेकर जूस बनाये , यह जोड़ों का कड़ापन ख़तम करके जोड़ो में लोचकता प्रदान करता है, और जोड़ो से यूरिक एसिड को बाहर निकलता है |

9. रीढ़ की अस्थि की समस्या –

अगर ऱीढ़ की अस्थि में समस्या है, तो तीन माह तक , चने के दाने बराबर चूना तीन माह तक दूध में डालकर दिन में एक बार पिए | नमक , शक्कर और रिफाइन ऑइल के स्थान पर सेंधा नमक , मिश्री और कच्ची घानी के तेल का ही प्रयोग करें |

निर्देश –

1 . समुद्री नमक { आयोडीन युक्त } के स्थान पर सेंधा नमक का प्रयोग करें |

2 . शक्क्कर के स्थान पर गुड़ का प्रयोग करें |

3.रिफाइन तेल का प्रयोग बिलकुल न करें , सिर्फ फ़िल्टर या कच्ची घानी के तेल का प्रयोग करें |

4 . एप्सम साल्ट { मैग्नेसियम सल्फेट } को गुनगुने पानी में डालकर उस पानी को 30 बार घुटनों पर डालें |

24 Oct 2020

प्राण योग से घाव ,चोट, मोच ,खरोंच एव ऑप्रेशन और एक्सीडेंट से अंगों की खोई प्राण शक्ति वापिस लाएं |

प्राण योग विज्ञानं के अनुसार विभिन्न चक्रों , पञ्च तत्त्व , पञ्च प्राण , और ऊर्जा के असंतुलन से विभिन्न प्रकार की व्याधियां उत्पन्न होती है , प्राण योग के द्वारा , प्राकृतिक तरीकों से शरीर में असंतुलित तत्वों , चक्रों, प्राणों को संतुलित किया जाता है | प्राण ऊर्जा चिकित्सा में एक निश्चित ध्वनि ,ऊर्जा , वाइब्रेशन पर शरीर के अंगों में सुधार की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है | इस प्राण योग ध्यान से आपको निम्न लिखित बीमारियों में लाभ मिलता है |

ऊर्जा प्रभाव निम्न लिखित में लाभकारी है 

लीवर की बीमारी,

किडनी की बीमारी

आँखों के दोष

कान सम्बन्धी समस्या ,

ह्रदय रोग ,

घुटनो की तकलीफ

पाचन तंत्र की बीमारी

रीढ़ की हड्ड़ी की समस्या ,

अस्थमा

टी बी रोग

कैंसर

जल जाना

गैस्ट्रिक

एसिडिटी

मायग्रेन

बालों की समस्या

एडी में दर्द चोट लगना ,

मोच आना घाव हो जाना ,

डायबिटीज

आभा मण्डल में वृद्धि

शरीर के चारों तरफ सुरक्षा कवच का निर्माण

ख़राब हो चुके अंगो में पुन : जीवनी शक्ति का उदय

रोग प्रतिरोधक शक्ति में वृद्धि

आदि में अत्यन्त उपयोगी |

विधि

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किसी एकांत स्थान पर पद्मासन , सुखासन , वज्रासन में या किसी भी आसन में बैठे , या फिर आसमान की तरफ सिर करके लेट जाये , हथेलियाँ आसमान की तरफ अधखुली रहें , फिर 15 बार लम्बी गहरी साँस लें , तत्पश्चात तकलीफ वाले स्थान या अपनी समस्या पर ध्वनि को महसूस करे तथा मन ही मन यह कल्पना करें कि आपकी तकलीफ या समस्या दूर हो रही है, और आपका जीवन उत्साह , ख़ुशी , समृद्धि और आनंद से परिपूर्ण हो रहा है | | 21 मिनिट बाद आपको दर्द से राहत महसूस होगी , श्रेष्ठ परिणाम के लिए 21 दिन तक प्रतिदिन कम से कम 21 मिनिट तक इस प्रक्रिया या ठीक होने तक दोहराएं | हैड फ़ोन का प्रयोग करने से ज्यादा अच्छे परिणाम मिलते है | प्रतिदिन सुबह – शाम 21 दिन तक कम से कम 21 मिनिट तक सुनने से बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त होते है |

प्राण ऊर्जा विशेषज्ञ – योगी योगानंद

Energetic Effects

Aura Cleansing

Healer energy Chakra Alignment

Restructures damaged organs by sending message to tissues and bringing them to original form .

Influences the energy field around you .

Influenced the energy field around your home and office .

Rapid healing of Burns, fractures , Sprain, cuts, and other Injuries.

It enhance the immune system .

प्राण योग चिकित्सा की विशेषताएं

1 किसी भी आयु वर्ग का कोई भी व्यक्ति इससे लाभ ले सकता है | {एक दिन से लेकर 100 वर्ष या उससे अधिक आयु के व्यक्ति }

2 .बीमार , अपाहिज , अशक्त सभी के लिए यह समान रूप से उपयोगी है |

3 .इसे कभी भी , कही भी , किसी भी अवस्था में सोते , जागते , चलते , फिरते किया जा सकता है | इसमें किसी भी प्रकार का बंधन नहीं है |

4 . यह तुरंत असरकारक है , बिना दवा , बिना इंजेक्शन , बिना जाँच , बिना फीस , बिना दुष्प्रभाव , तुरंत आराम |

5 .यह प्राण सन्तुलन , चक्र संतुलन , पञ्च तत्त्व संतुलन , असंतुलित ऊर्जा को शरीर में संतुलित करता है, इसलिए बिना दुष्प्रभाव तुरंत असर दिखाता है |

6 . यह व्यक्ति के तीनो प्रकार के स्वास्थ शारीरिक , मानसिक , आध्यात्मिक में वृद्धि करता है |

7 . यह प्राण योग व्यक्ति के भूतकाल , वर्तमान और भविष्य से भी सम्बंधित है |

8 . यह व्यक्ति के शरीर की अवरूद्ध हो गयी ऊर्जाओं के पुन : संतुलन पर आधारित है |

9 . प्राण योग में प्रकृति प्रदत्त समस्त वस्तुओं का इलाज में प्रयोग किया जाता है |

10 .यह प्राण योग पद्धति हमारे ऋषि -मुनियों द्वारा दी गयी प्राचीन महान विद्या है, जो वर्तमान विज्ञानं से हजारों -हजार साल आगें है |

24 Oct 2020

बढ़ती उम्र को प्राण योग से नियंत्रित करें | Pran yoga for anti ageing

वैज्ञानिक व्याख्या

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प्राण योग आपके चक्र { अन्त स्त्रावी ग्रंथियों } से निकलने वाले हार्मोन्स को नियंत्रित करता है, फलस्वरूप आप हमेशा युवा जवान दिखाई देने लगते है , प्राण योग आपके मस्तिष्क से निकलने वाली अल्फ़ा , बीटा , डेल्टा तरंगो को बढ़ा देता है, फलस्वरूप आप शांत , ऊर्जावान और तरोताजा महसूस करते है, प्राण योग ध्यान की तरंगे आपके आंतरिक अंगो पर एक्यूप्रेसर की तरह कार्य करती है, फलस्वरूप नयी कोशिकाओं का निर्माण होने से लम्बे समय तक युवा और अनेक बीमारियों से बचे रहते है |

विधि

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प्राण योग ध्यान को सुनना शुरू कीजिये ,सीधे आसमान की तरफ मुँह करके लेट जाएँ हथेलियां आसमान की तरफ अधखुली हो , शरीर को शिथिल छोड़ दीजिये , आँखे बंद कीजिये , अब दाएं हाथ के अंगूठे से अपनी दांयी नाक के नथुने को बंद कीजिये , और बाएं नथुने से साँस खींचते हुए यह कल्पना कीजिये की प्राण ऊर्जा आपके शरीर में आ रही है , जो आपको लगातार युवा बनाये रखने सहित, समस्त समस्याओं को ठीक करने जा रही है , साँस को रोककर रखिये , जब तक घबराहट न होने लगे , साँस को रोके रखिये , फिर जब बहुत ज्यादा तकलीफ होने लगे फिर दाएं नथुने से बाहर निकाल दीजिये | अब बाएं नथुने को अनामिका अंगुली से बंद कीजिये , दायें नथुने से साँस खींचिए , और रोक कर रखिये , जब तक आपको घबराहट न होने लगे , अब बाएं से छोड़िये , आपको जिस तरफ से साँस लेना है, उसके विपरीत तरफ से छोड़ना है , और जिस तरफ से आपने साँस छोड़ी है, उसी तरफ से आपको लेनी है | ऐसा 11 बार करें , हर बार ज्यादा देर तक साँस रोकने का अभ्यास करें , फिर शरीर को शिथिल छोड़ दें , प्राण योग ध्यान मैडिटेशन की ध्वनि को आपने सभी चक्रों पर 1 -1 मिनिट तक महसूस करे | अब आँखे खोल लीजिये , आप अपने आप को एक नयी दिव्य ऊर्जा से परिपूर्ण पायेगें | और हा, अपनी प्रतिक्रिया , देना न भूलें , मुझे इंतजार रहेगा |

24 Oct 2020

अपने शरीर को पावरहाउस कैसे बनाये |

अपनी प्राण ऊर्जा को संतुलित करें, Balance Your Energy

इस प्राण योग ध्यान के माध्यम से आपके चक्र { अन्त स्त्रावी ग्रंथियों } , पञ्च तत्त्व , पञ्च प्राण , को संतुलित किया गया है, फलस्वरूप आपकी किसी भी शारीरिक मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा को यह ध्यान संतुलित करने का कार्य करता है, प्राण योग ध्यान की तरंगे आपके आंतरिक अंगो पर एक्यूप्रेसर की तरह कार्य करती है, जिससे आपको तुरंत लाभ महसूस होने लगता है |

विधि –

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प्राण योग ध्यान को सुनना शुरू कीजिये ,सीधे आसमान की तरफ मुँह करके लेट जाएँ हथेलियां आसमान की तरफ अधखुली हो , शरीर को शिथिल छोड़ दीजिये , आँखे बंद कीजिये , अब दाएं हाथ के अंगूठे से अपनी दांयी नाक के नथुने को बंद कीजिये , और बाएं नथुने से साँस खींचते हुए यह कल्पना कीजिये की प्राण ऊर्जा आपके शरीर में आ रही है , , साँस को रोककर रखिये , जब तक घबराहट न होने लगे , साँस को रोके रखिये , फिर जब बहुत ज्यादा तकलीफ होने लगे फिर दाएं नथुने से बाहर निकाल दीजिये | अब बाएं नथुने को अनामिका अंगुली से बंद कीजिये , दायें नथुने से साँस खींचिए , और रोक कर रखिये , जब तक आपको घबराहट न होने लगे , अब बाएं से छोड़िये , आपको जिस तरफ से साँस लेना है, उसके विपरीत तरफ से छोड़ना है , और जिस तरफ से आपने साँस छोड़ी है, उसी तरफ से आपको लेनी है | ऐसा 11 बार करें , हर बार ज्यादा देर तक साँस रोकने का अभ्यास करें , फिर शरीर को शिथिल छोड़ दें , प्राण योग ध्यान मैडिटेशन की ध्वनि को आपने सभी चक्रों पर 1 -1 मिनिट तक महसूस करे | अब आँखे खोल लीजिये , आप अपने आप को एक नयी दिव्य ऊर्जा से परिपूर्ण पायेगें | विशेष – ह्रदय रोगी , और उच्च रक्त चाप के मरीज , साँस रोके बिना सिर्फ आँखे बंद करके प्राण योग ध्वनि को सुने |

 

23 Oct 2020

तीसरा नेत्र खोलें – अलौकिक शक्तियों का प्रकटीकरण |

आज्ञा चक्र का जागरण आज्ञा चक्र मस्तक के मध्य में, भौंहों के बीच स्थित है। इस कारण इसे “तीसरा नेत्र” भी कहते हैं। आज्ञा चक्र स्पष्टता और बुद्धि का केन्द्र है। यह मानव और दैवी चेतना के मध्य सीमा निर्धारित करता है। यह 3 प्रमुख नाडिय़ों, इडा (चंद्र नाड़ी) पिंगला (सूर्य नाड़ी) और सुषुम्ना (केन्द्रीय, मध्य नाड़ी) के मिलने का स्थान है। जब इन तीनों नाडिय़ों की ऊर्जा यहां मिलती है और आगे उठती है, तब हमें समाधि, सर्वोच्च चेतना प्राप्त होती है। इसका मंत्र है ॐ। आज्ञा चक्र का रंग सफेद है। इसका तत्व आकाश तत्त्व है। इसका चिह्न एक श्वेत शिवलिंगम्, सृजनात्मक चेतना का प्रतीक है। इस स्तर पर केवल शुद्ध मानव और दैवी गुण होते हैं।

आज्ञा चक्र की साधना विधि

किसी शांत स्थान पर ज्ञान मुद्रा में बैठे | शरीर को शिथिल करते हुए 15 बार लम्बी गहरी साँस लें | प्राण योग वीडियो शुरू करें , और आज्ञा चक्र से निकलने वाली ऊर्जा को देखते हुए , अपनी आँखे बंद करे, और वही ऊर्जा अपने आज्ञा चक्र पर अनुभव करें और ॐ मंत्र का मानसिक जाप करते हुए , वीडियो से निकल रही ध्वनि को अपने आज्ञा चक्र पर अनुभव करें |

समयावधि – प्रतिदिन 21 मिनिट

कालावधि– 21 दिन से लेकर 3 माह तक |

आज्ञा चक्र के जागरण के प्रभाव

1. इससे भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों प्रत्यक्ष दिखने लगते है और भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के पूर्वाभास भी होने लगते हैं। साथ ही हमारे मन में पूर्ण आत्मविश्वास जाग्रत होता है जिससे हम असाधारण कार्य भी शीघ्रता से संपन्न कर लेते हैं।

2. जागरण से पूरा शरीर उर्जा से आप्लावित हो जाता है जिससे किसी बीमार व्यक्ति को स्पर्श करके ही रोग मुक्त कर सकते हैं।

3. किसी अपराधी प्रवृति के युवक या युवती की गलत सोंच को ख़त्म कर उसे सही राह पर लाया जा सकता है। रात दिन तनाव में रहने वाले व्यक्ति को माइण्ड फ्री और फ्रेस बनाया जा सकता है।

4. किसी की उलझी हुई गुथियों को सुलझाया जा सकता है। नशा पान करने वालों को पूर्ण स्वस्थ किया जा सकता है।

5. ज्ञान के क्षेत्र में महारथ हासिल कर सकता है। जिस व्यक्ति की ऊर्जा यहां ज्यादा सक्रिय है तो ऐसा व्यक्ति बौद्धिक रूप से संपन्न, संवेदनशील और तेज दिमाग का बन जाता है लेकिन वह सब कुछ जानने के बावजूद मौन रहता है। इसे ही बौद्धिक सिद्धि कहा जाता हैं।

6. आज्ञाचक्र की संगति शरीरशास्त्री आप्टिकल कायजमा, पिट्यूटरी एवं पीनियल ग्रन्थियों के साथ बिठाते है। यह ग्रन्थियाँ भ्रूमध्य की सीध में मस्तिष्क में है। इनसे स्रवित होने वाले हारमोन स्राव समस्त शरीर के अति महत्वपूर्ण मर्मस्थलों को प्रभावित करते है |

7. भाग्य और भविष्य बनाने की कुँजी हाथ लग जाती। इस स्थिति में चित की चंचलता समाप्त हो जाती है, बुद्धि में पवित्रता और शुचिता का उदय होता है, आसक्ति का अवशेष तक नहीं रहता, संकल्पशक्ति अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाती है तथा सत्संकल्प पूरे होने लगते है, व्यक्ति में अतीन्द्रिय अनुभूतियों और सिद्धियों का चमत्कार प्रकट होने लगता है, उसके शाप-वरदान फलित होने लगते है; वाणी में ओज, मुखमण्डल पर तेज और आँखों में चमक विराजने लगती है। इनके अतिरिक्त अन्य अनेक प्रकार की विशेषताएँ साधक में प्रकट और प्रत्यक्ष होती दिखाई पड़ती है।

8. आज्ञाचक्र के जागरण के समय का अनुभव बताते हुए तत्त्वदर्शी आत्मवेत्ता कहते है कि यह लगभग वैसा ही होता है, जैसा चरस, गाँजा, भाँग या एल.एस.डी. जैसे रसायनों के सेवन से प्राप्त होता है, पूर्ण जाग्रत स्थिति में जब भ्रूमध्य पर ध्यान एकाग्र किया जाता है, तो वहाँ दीपशिखा की भाँति एक ज्योति दिखाई पड़ती है।

9. आज्ञाचक्र के जागरण के बाद शेष चक्रों के उन्नयन के लिए दो प्रकार के क्रम अपनाये जाते है। एक में आज्ञाक्रम के उपरान्त विशुद्धि, अनाहत, मणिपूरित -इस क्रम में बढ़ते हुए मूलाधार तक पहुँचना पड़ता है, जबकि दूसरे में आज्ञाचक्र के बाद मूलाधार से शुरुआत कर ऊपर की ओर बढ़ते हुए स्वाधिष्ठान, मणिपूरित, अनाहत होकर विशुद्धि तक पहुँचते है। इन दोनों में से किसी को भी रुचि और सुविधा के अनुसार अपनाया जा सकता है, पर दोनों ही क्रमों में आज्ञाचक्र का प्रथम जागरण अनिवार्य है, अन्यथा दूसरे चक्रों के विकास से उत्पन्न हुई शक्ति को सँभाल पाना कठिन होगा।

10. जब मनुष्य के अन्दर आज्ञा चक्र जागृत हो जाता है तब मनुष्य के अंदर अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से मनुष्य के अन्दर सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं और मनुष्य एक सिद्धपुरुष बन जाता है। अतः जब इस चक्र का हम ध्यान करते हैं तो हमारे शरीर में एक विशेष चुम्बकीय उर्जा का निर्माण होने लगता है उस उर्जा से हमारे अन्दर के दुर्गुण ख़त्म होकर, आपार एकाग्रता की प्राप्ति होने लगती है।

11. विचारों में दृढ़ता और दृष्टि में चमक पैदा होने लगती है। आज्ञा चक्र ध्यान प्रतिदिन करें, , , यदि आप ठीक ध्यान कर रहे हैं .. यहाँ पर ध्यान करने से आप भोजन न भी करे तब भी आप अपने भीतर अत्यधिक ऊर्जा अनुभव करेंगें, , आप जो भी कार्य करेंगे पूरी शक्ति से कर पाएंगे, , यहाँ पर ध्यान करने से संकल्प शक्ति अत्यधिक मजबूत हो जाती है।

12. आज्ञा चक्र ही मात्र एक मात्र चक्र है जिसके जाग्रत होने पर आप ब्रह्मांड की अनन्त ऊर्जा से एक हो सकते है इसे हम परमात्मा की पारलौकिक संसार का प्रवेश द्वार कह सकते है, , यहाँ जो आपके अनुभव होंगे वे अनुभव बाकि नीचे के चक्रो में कभी नहीं हो सकते, , यहाँ इस चक्र पर जब ऊर्जा पहुचती है तभी आप गहरे ध्यान में व समाधि में उतर सकते है और अनन्त आनन्द, , अनन्त ऊर्जा का अनुभव कर सकते है।

23 Oct 2020

कुंडलिनी जागरण – प्राण योग द्वारा कुंडलिनी जागरण सबसे सरल , सबसे शक्तिशाली

कुण्डलिनी क्या है

मनुष्य के अन्दर छिपी हुई अलौकिक शक्ति को कुण्डलिनी कहा गया है। कुण्डलिनी वह दिव्य शक्ति है जिससे जगत मे जीव की श्रृष्टि होती है। कुण्डलिनी सर्प की तरह साढ़े तीन फेरे लेकर मेरूदण्ड के सबसे निचले भाग में मुलाधार चक्र में सुषुप्त अवस्था में पड़ी हुई है। मुलाधार में सुषुप्त पड़ी हुई कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होकर सुषुम्ना में प्रवेश करती है तब यह शक्ति अपने स्पर्श से स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र, तथा आज्ञा चक्र को जाग्रत करते हुए मस्तिष्क में स्थीत सहस्त्रार चक्र मंे पहंुच कर पुर्णंता प्रदान करती है इसी क्रिया को पुर्ण कुण्डलिनी जागरण कहा जाता है। जब कुण्डलिनी जाग्रत होती है मुलाधार चक्र में स्पंदन होने लगती है उस समय ऐसा प्रतित होता है जैसे विद्युत की तरंगे रीढ़ की हड्डी के चारों तरफ घुमते हुए उपर की ओर बढ़ रहा है। साधकांे के लिए यह एक अनोखा अनुभव होता है। जब मुलाधार से कुण्डलिनी जाग्रत होती है तब साधक को अनेको प्रकार के अलौकिक अनुभव स्वतः होने लगते हैं। जैसे अनेकों प्रकार के दृष्य दिखाई देना अजीबोगरीब आवाजें सुनाई देना, शरीर मे विद्युत के झटके आना, एक ही स्थान पर फुदकना, इत्यादि अनेकों प्रकार की हरकतें शरीर मंे होने लगती है। कई बार साधक को गुरू अथवा इष्ट के दर्शन भी होते हैं। कुण्डलिनी शक्ति को जगाने के लिए प्रचिनतम् ग्रंथों मे अनेकों प्रकार की पद्धतियों का उल्लेख मिलता है। जिसमें हटयोग ध्यानयोग, राजयोग, मत्रंयोग तथा शक्तिपात आदि के द्वारा कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत करने के अनेकांे प्रयोग मिलते हैं। परंतु मात्र भस्रीका प्राणायाम के द्वारा भी साधक कुछ महिनों के अभ्यास के बाद कुण्डलिनी जागरण की क्रिया में पुर्ण सफलता प्राप्त कर सकता है। जब मनुष्य की कुण्डलीनी जाग्रत होती है तब वह उपर की ओर उठने लगती है तथा सभी चक्रों का भेदन करते हुए सहस्त्रार चक्र तक पंहुचने के लिए बेताब होने लगती है। तब मनुष्य का मन संसारिक काम वासना से विरक्त होने लगता है और परम आनंद की अनुभुति होने लगती है। और मनुष्य के अंदर छुपे हुए रहस्य उजागर होने लगते हैं। मनुष्यों के भीतर छुपे हुए असिम और अलौकिक शक्तियों को वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार किया है। आज कल पश्चिमी वैज्ञानिकों के द्वारा शरीर में छुपे हुए रहस्यों को जानने के लिए अनेकों शोध किये जा रहे हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि जिस तरह पृथ्वी के उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवों मे अपार आश्चर्य जनक शक्तियों का भंडार है ठीक उसी प्रकार मनुष्य के मुलाधार तथा सहस्त्रार चक्रों मे आश्चर्यजनक शक्तियों का भंडार है। आगामी अंकों में कुण्डलिनी जागरण करने की विधियो को विस्तार पुर्वक लिखने का प्रयास रहेगा जिससे कोइ भी साधक अपनी कुण्डलिनी शक्ति को जगा कर आत्म ज्ञान प्राप्त कर सके।

प्राण योग द्वारा कुंडलिनी जागरण सबसे सरल , सबसे शक्तिशाली

साधना विधि

सर्वप्रथम सिद्धासन में बैठ जाएं आंखें बंद करें प्राण योग मैडिटेशन को सुनना प्रारंभ कीजिए दाएं नथुने को बंद कर के बाएं नासिका से सांस उदर में भर लीजिये , इसके पश्चात रेचन क्रिया प्रारंभ कीजिये ,{ वायु को तेजी से बाहर फेंकने की प्रक्रिया } इसके पश्चात उड्डियान बन्ध लगाते हुए अश्विनी मुद्रा शुरू कीजिए अपनी सामर्थ्य और शक्ति के अनुसार इस अवस्था में रहे प्रत्येक सप्ताह अभ्यास को बढ़ाते रहें इससे आपकी कुंडलिनी शक्ति जागृत होगी और प्राण का उद्गम होने से सुषुम्ना में चीटियों के सुखद अनुभव होंगे , और अतीव आनद की प्राप्ति होगी |

समयावधि – 1 घण्टे प्रतिदिन

कालावधि – 21 दिन से लेकर 3 माह तक करें |

23 Oct 2020

आपकी समस्याओं का कारण — कही ये तो नहीं ? पृथ्वी की नकारात्मक ऊर्जा |

आपकी समस्याओं का कारण — कही ये तो नहीं ? पृथ्वी की नकारात्मक ऊर्जा |

पृथ्वी लगातार हमें अपनी चुंबकीय शक्ति , पञ्च तत्त्व की पूर्ति से अनेक तरह तरह के तरीकों से निरोग बनाने का कार्य करती है, परन्तु कही कही इसका नकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिलता है , वैज्ञानिक इसे जियोपैथिक स्ट्रेस कहते है, यह क्या होता है, इसके प्रभाव क्या होते है, इसको कैसे पहचाने, इसे दूर करने के क्या उपाय है |

जियोपैथिक स्ट्रेस

जियो का अर्थ होता है – पृथ्वी और पैथिक के दो अर्थ होते है – पहला रोग और दूसरा अर्थ रोग का निवारण | जियोपैथिक स्ट्रेस की प्रचलित परिभाषा के अनुसार इसका मतलब होता है ऐसी पीड़ा या परेशानी जो की पृथ्वी के प्रभाव का कारण होती है | जर्मन शोधकर्ता Baron Gustav Frei Herr Von Pohl ने जियोपैथिक ज़ोन शब्द का इजात किया था | geopathic stress zone and vastuउन्होंने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा जियोपैथिक स्ट्रेस जोन पर शोध करने में बिताया और इस नतीजे पर पहुंचे की लगभग प्रत्येक बीमारी का कुछ न कुछ सम्बन्ध जियोपैथिक स्ट्रेस से पाया जा सकता है | इस शब्द का उपयोग उस अवस्था के लिए किया जाता है जब प्राकृतिक या मानव निर्मित कारणों से पृथ्वी से निकलने वाली उर्जा मनुष्य के ऊपर नकारात्मक प्रभाव डालती है | यानि की पृथ्वी से उत्पन्न नुकसानदायक तरंगो के मनुष्य पर पड़ने वाले हानिकारक प्रभाव को जियोपैथिक स्ट्रेस कहा जाता है | यह भी एक तरह का वास्तु दोष है क्योंकि इसमें भी घर के अन्दर अशुभ उर्जा का प्रवाह होता है |

जियोपैथिक स्ट्रेस जोन आखिर होता क्या है ?

पृथ्वी पर उर्जा का प्रवाह उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम की ओर विशाल ग्रिड लाइन्स के रूप में होता है | इसके परिणामस्वरूप एक विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र का निर्माण होता है | इन ग्रिड लाइन्स को हर्टमैन ग्रिड और करी ग्रिड लाइन्स के रूप में जाना जाता है |

जियोपैथिक स्ट्रेस जोन से उत्पन्न समस्याएं –

जयोपैथिक स्ट्रेस के अंतर्गत निकलने वाली उर्जायें एक सामान्य मनुष्य के उर्जा के स्तर से कई गुना ज्यादा शक्तिशाली होती है | इसीलिए अगर आप ऐसे स्ट्रेस जोन में सोते है या ज्यादा वक्त बिताते है जो की किसी Magnetic Grid Line या underground water system से उत्पन्न होने वाली तरंगो से प्रभावित है तो इसका आप पर बुरा असर पड़ सकता है | जियोपैथिक स्ट्रेस कई तरह की बीमारियों का कारण बनता है | इससे होने वाली बिमारियों में कैंसर सबसे घातक है, यहाँ तक की टयुमर्स तो तकरीबन हमेशा बिलकुल उस स्थान पर विकसित होते है जहाँ पर दो या अधिक जियोपैथिक स्ट्रेस लाइन्स किसी आदमी के शरीर से होकर गुजरती है जहाँ पर वो सोता है | डॉ. मैनफेड ने अपने अध्ययन में पाया कि प्राकृतिक विद्युत् रेखाओं का एक जाल पृथ्वी को घेरे हुए है | ये रेखाएं ईशान (North-East) से नैऋत्य (South-West) की ओर व आग्नेय (South-East) से वायव्य (North-West) की ओर प्रवाहमान रहती है | उर्जा रेखाओं के इस प्रवाह को करी ग्रिड (Currie Grid) के नाम से जाना जाता है | इन रेखाओं के मिलन बिन्दुओं पर सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव दोगुना हो जाता है | ये जियोपैथिक स्ट्रेस के सम्बन्ध में हुए शोध ये बताते है की ऐसे 85% मरीज जो कैंसर से मर जाते है ऐसा उनके जियोपैथिक स्ट्रेस जोन में ज्यादा संपर्क में रहने के कारण हुआ | दुनिया के प्रसिद्ध कैंसर विशेषज्ञ और जर्मन डॉक्टर Hans Nieper ने बताया है की उनके 92% कैंसर के मरीज जियोपैथिक स्ट्रेस से प्रभावित थे | इसी क्षेत्र में शोध करने वाले एक एक प्रमुख शख्सियत Von Pohl जिन्होंने जियोपैथिक ज़ोन शब्द का इजाद किया, उन्होंने Central Committee for Cancer Research, Berlin, Germany, के सामने ये साबित किया की किसी व्यक्ति को कैंसर की सम्भावनाये बहुत कम हो जाती है अगर उसने अपना समय जियोपैथिक स्ट्रेस जोन में ना बिताया हो, विशेष तौर पर सोते वक्त क्योंकि सामान्यतया जहाँ हम सोते है वहाँ GS जोन का असर ज्यादा होता है क्यूंकि उस वक्त हम स्थिर और ज्यादा ग्राह्य होते है | कैंसर पर जियोपैथिक स्ट्रेस जोन के असर को लेकर हुआ शोध और भी पुख्ता हो जाता है जब हम इस मसले पर अन्य शोधकर्ताओं के रिसर्च को देखते है | जैसे की डॉक्टर Ernst Hartmann, MD ने भी जियोपैथिक स्ट्रेस को कैंसर Dr. Ernst hartmann grid and Geopathic stress के सबसे मुख्य कारणों में से एक माना है | उन्होंने कहा है की हम सभी कैंसर के लिए जिम्मेदार सेल्स पैदा करते है, लेकिन वो हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानि की इम्यून सिस्टम के कारण साथ के साथ नष्ट भी कर दिए जाते है | लेकिन जब आप GS जोन के प्रभाव में आते है तो वो सीधे तौर पर आपको कैंसर तो नहीं देता है लेकिन कैंसर सेल्स को नष्ट करने के लिए जरुरी इम्यून सिस्टम को ही वो कमजोर कर देता है जिससे आपके कैंसर सेल्स नष्ट होने बंद हो जाते है और फिर वो ही कैंसर का कारण बनता है | सिर्फ कैंसर ही नहीं बल्कि गंभीर दीर्घकालीन बीमारियों और मनोरोगों की स्थिति में भी जियोपैथिक स्ट्रेस एक बड़े कारण के रूप में सामने आया है | इसके कारण नींद ना आने की समस्या, सिरदर्द, बैचेनी, और बच्चों का चिडचिडा व्यवहार जैसी समस्याएँ भी आती है |

लक्षण 

लक्षण जिनसे आप जियोपैथिक स्ट्रेस जोन का पता लगा सकते है,

जैसे कि – घर में अशांति का वातावरण होना

डिप्रेशन

बार बार बीमार होना

पेड़ का टेढ़ा मेढ़ा होना

सिरदर्द

दवाइयों का असर न करना

बच्चों को सोने में परेशानी होना

विधुत सम्बन्धी उपकरणों के प्रति संवेदनशीलता

बगीचे में किसी स्थान पर घास का ना उगना

दीवारों में दरारों का आना

पैरासाइट्स, बैक्टीरिया, वायरस की मौजूदगी

मधुमक्खियों का छत्ता

घर में सोने पर डरावने सपने आना

सड़क हादसों की अधिकता वाले स्थान

नींद ना आने की समस्या

बैचेनी

बच्चों का चिडचिडा व्यवहार

23 Oct 2020

108 ॐ मंत्र जाप – सभी समस्याओं का निदान |

108 ॐ मंत्र जाप – ॐ मंत्र के माध्यम से अपना और दूसरों का इलाज कैसे करें

 ॐ मंत्र के माध्यम से अपना और दूसरों का इलाज कैसे करें , ॐ इस ब्रह्माण्ड का सबसे शक्तिशाली मंत्र है, क्योंकि इस मंत्र की धवनि से जो तरंगे निकलती है, वो समस्त चक्रों को संतुलित कर देती है, फलस्वरूप व्यक्ति की सभी समस्याओं का समाधान स्वः होने लगता है | ॐ से आप वैसे ही किसी का भी उपचार कर सकते है, जैसा रैकी , या प्राणिक हीलिंग में किया जाता है , परन्तु इसमें आपको 21 दिन तक साधना करनी पड़ती है, क्योकि बिना साधना के आपकी हीलिंग शक्ति पावरफुल नहीं होती , और न ही आप मरीज की नकारात्मक ऊर्जा से आपने को सुरक्षित रख पाते है | 21 दिन बाद ॐ से इलाज की प्रक्रिया सिखाई जाएगी |

समयावधि –

प्रतिदिन 26 मिनिट्स

कालावधि – 21 दिन तक साधना करें |

108 ॐ मंत्र जाप उपयोगिता

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घर में अशांति का वातावरण होना

डिप्रेशन

बार बार बीमार होना

ब्लड प्रेस्सर

सिरदर्द

बच्चों को सोने में परेशानी होना

घर में सोने पर डरावने सपने आना

नींद ना आने की समस्या

बैचेनी

बच्चों का चिडचिडा व्यवहार

एकाग्रता

स्मरण शक्ति 

बात बात पर गुस्सा आना

तनाव

थकान

साधना – खुद के कल्याण हेतु

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ॐ मंत्र साधना ऐसे करें उच्चारण

1. शांत स्थान पर किसी भी आरामदायक मुद्रा में बैठिए।

2. आंखें बंद करके शरीर और नसों को ढीला छोड़िए।

3. 9 बार लम्बी गहरी सांसें लीजिए।

4. यूट्यूब पर दिए गए वीडियो को शुरू कीजिये और ॐ मंत्र का जाप साथ साथ करिए और इसके कंपन को पुरे शरीर पर महसूस कीजिए।

5. ॐ नाद के समाप्त होने तक ॐ मंत्र का जाप करते रहिए।

6. ॐ नाद के समाप्त होने पर अपनी आंखें खोलिए। और हाथो को आपस में रगड़कर सम्पूर्ण शरीर को अपने हाथों से प्राण ऊर्जा दीजिये , अब आपकी समस्या से आपको छुटकारा मिलता हुआ प्रतीत होगा |

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